Saturday, October 23, 2010

इतनी छूट क्यों?


आखिर भाई लोग चाहते क्या हैं ? साथ ही साथ हमारे देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार की मंशा क्या है? जम्मू कश्मीर के अलगाव वादी नेता और डेढ़ सयाने बुद्धिजीवी दिल्ली में मजमा लगाकर देश और संविधान के खिलाफ जहर उगलते रहें और देश के कर्णधार उनके भाषणों की सीडी देखने के बाद कुछ करने या न करने की बात करें तो इस विडम्बना पर रोने के सिवा हम और आप क्या कर सकते है? लेकिन इस रोने धोने से कुछ होने वाला नहीं है.क्योंकि दिल्ली की गद्दी पर बैठे सत्ताधीश देश और संविधान को लेकर इतने गंभीर है ही नहीं। वर्ना जब अलगाववादी देश की राजधानी में राष्ट्रद्रोह को बढ़ावा देने का काम कर रहे थे, तब केंद्र सरकार कार्रवाई करने के बजाय हाथ पर मूकदर्शक बनी क्यों बैठी रही। ध्यान रहे की संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
अलगाववादियों ने सरकार की नाक के ठीक नीचे राष्ट्रद्रोह को बढ़ावा देने के लिए एक सम्मेलन आयोजित किया। इसमें कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ नक्सलियों व खालिस्तान समर्थकों ने भी देश की एकता व अखंडता के खिलाफ जमकर जहर उगला। इस घटना से पूरा देश स्तब्ध है लेकिन यह बेहद आश्चर्यजनक है कि सब कुछ जानने-समझने के बावजूद केंद्र सरकार चुपचाप देखती रही। मूकदर्शक बनी रही । यह देश को मंजूर नहीं है और होना भी नहीं चाहिए।
हुर्रियत नेता गिलानी की कश्मीरियत की परिभाषा कश्मीर के लोगों व वहां की संस्कृति से एकदम अलग है। गिलानी लोगों को सिर्फ नफरत सिखा रहे हैं। इस समस्या का तानाबाना भले ही सरहद पार बुना जाता हो, लेकिन दिल्ली की सरकार भी कम नहीं है। यहां पर कश्मीर समस्या एक उद्योग बन गई है। राजनीतिक वर्ग ने बेहद निकम्मेपन का सबूत दिया है। कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला व उनके पिता केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला को किसने आगे बढ़ाया है? आखिरकार राजनीति में चंद खानदान ही नजर क्यों आते हैं। देश के वफादार की जगह निजी वफादार से राजनीति चले, इस सोच से यह सब हो रहा है।
अब जरा



हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के बयां को भी देखें। गिलानी ने कश्मीर पर नियुक्त किए गए केंद्र सरकार के वार्ताकारों को फिजूल बताते हुए इनका बहिष्कार करने की घोषणा कर दी उनहोंने केंद्र सरकार के इस कदम को फरेबकारी बताते हुए सिर्फ समय टालने वाला कवायद बताया । उनकी आवाज में आवाज मिलाते हुए लेखिका अरुंधति राय भी कह गयी कि कश्मीर कभी भारत का अभिन्न अंग रहा ही नहीं। उन्होंने भारत को उपनिवेशवादी भी बताया।
गिलानी ने राजधानी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने जो वार्ताकार नियुक्त किए हैं, उनका राज्य के सभी गुटों को बहिष्कार करना चाहिए। ये वार्ताकार वहां जा कर क्या करेंगे। यह तो सभी को मालूम है कि राज्य की जनता क्या चाहती है। घाटी ही नहीं, बल्कि जम्मू और लद्दाख के लोगों को हिंदुस्तान के बलपूर्वक कब्जे से आजादी चाहिए। गिलानी के मुताबिक सिर्फ मुसलमान ही नहीं, राज्य के हिंदू और सिखों को भी आत्म निर्णय का हक चाहिए। इसका पता करने के लिए किसी वार्ताकार की जरूरत नहीं है। यह सिर्फ समय बिताने की फरेबकारी कवायद है।
राजनीतिक कैदियों की आजादी के लिए समिति' की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन संसद पर हमले के आरोप से बरी हो चुके एसएआर. गिलानी ने किया। इसी मौके पर लेखिका अरुंधति राय ने भी अलगाववादियों के पक्ष में जम कर तर्क दिए। इन अलगाववादी आंदोलनों को उन्होंने जन-आंदोलन बताया। साथ ही कहा कि कश्मीर को बार-बार भारत का अभिन्न अंग बताया जाता है, जबकि यह कभी अभिन्न अंग रहा ही नहीं। उनहोंने कहा कि चाहे कश्मीर के आंदोलनकारी हों या नगालैंड के या फिर नक्सली, ये जन आंदोलन हैं। इसलिए इनकी आवाज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहिए। वैसे तो विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन भी जन आंदोलन है, लेकिन इसमें फर्क यह है कि यह 'सबके लिए न्याय' के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, जबकि अलगाववादी बताए जाने वाले ये आंदोलन इस भावना पर आधारित हैं। अब इन लेखिका से पूछा जाना चाहिए कि सीमा पर कि मदद से चलाये जा रहे देश विरोधी अभियान को जन आन्दोलन कैसे कहा जा सकता है? मैडम अयून्धाती राय का सारा चितन अभिजात्य सोच पर आधारित है। वे उस वर्ग की लेखिका है जो इस भारत गणराज्य की गरीबी पर पंचतारा होटलों में बैठकर वाग्विलास करते है। देश की जमीनी सच्चाई का उनको जरा भी अहसास नहीं है। गिलानी किस मुह से कश्मीर के हिन्दुओं की बात कर सकते है । खासकर तब जब कि लाखो कश्मीरी पंडित अब भी दिल्ली और आस पास खानाबदोशों कि जिंदगी जी रहे हों। अरुंधती राय ने भोग ही क्या है? नक्सली हिंसा में जो निरपराध मारे गए उनका दोष क्या था? यह किस तरह का जन आन्दोलन है जिसमे जन से ज्यादा गन ( बन्दूक) कि आवाज़ सुने पड़ती है। मैडम राय खुलेआम देशद्रोह का महिमा मंडन कर रही थी और देश कि कठपुतली सरकार मौन थी। यह बेहद शर्मनाक है। विहिप के आन्दोलन की तुलना कश्मीरी आतंक वादियों से करना मानसिक दिवालियापन ही कहा जा सकता है। क्या एक परिपक्व लोकतंत्र का अर्थ यह है कि जिसके मन में जो आये बक दे। इस तरफ भी विचार होना चाहिए।

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