Friday, October 22, 2010

कर्नाटक का नाटक


कर्नाटक का यह राजनैतिक ड्रामा गोवा और झारखंड में हो चुके नाटक की पुनरावृत्ति ही है। सवा ल उठता है कि लोकतंत्र कैसे काम करेगा, यदि इसके रक्षक ही भक्षक बनने पर उतारू हो जाएं? यहां तो विधायक से लेकर मंत्री तक और स्पीकर से लेकर गवर्नर तक सभी अपने अपने हिसाब से खेल खेलने लगे हैं और ऐसा करते समय नियमों और कायदों को अंगूठा दिखाने लगे हैं। ऐसी हालत में अदालत का ही आसरा रह जाता है। राज्यपाल का उत्साह तो इस खेल में देखते बन रहा था। उन्होंने आनन फानन में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। जब केंद्र की सरकार ने उस सिफारिश को गर्मजोशी से नहीं लिया तो फिर राज्य सरकार को दुबारा विश्वास मत हासिल करने को कह दिया। जिन विधायकों को स्पीकर ने विधानसभा की सदस्यता से बर्खास्त कर दिया, वे अदालत की शरण में चले गए और अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रखकर और फैसले का दिन आगे खिसकाकर भ्रम को और भी बढ़ाने का काम किया। यह बहुत ही शर्मनाक है कि विधायकों को रिजॉर्ट में ताला लगाकर बंद रखा गया। उन्हें जेट विमानों और हेलिकॉप्टरों की सहायता से पड़ोसी राज्यों मे ले जाया गया। पांच सितारा होटलों में ठहराया गया। यदि इस तरह की घटनाएं घटती हैं, तो फिर सदन में बहुमत परीक्षण की जांच निष्पक्षता से कैसे हो सकती है? एक पूर्व मुख्यमंत्री डी कुमारस्वामी दूसरी पार्टी के विधायकों को भेड़ की तरह दूसरे राज्यों में ले जाते दिखाई दिए और लोकलाज को दरकिनार कर दूसरी पार्टी के असंतुष्ट विधायकों के प्रवक्ता की तरह बोते नजर आए। कांग्रेस का खेल भी इस प्रकरण में गंदा रहा। मुख्यमंत्री ने जिस तरह से सोमवार को विधानसभा में विश्वासमत हासिल किया वह तरीका अनेक सवाल पैदा कर रहा था। स्पीकर ने जिस तरह से भाजपा के असंतुष्ट विधायकों और निर्दलीयों की सदस्यता समाप्त की वह भी कई लोगों को समझ में नहीं आ रहा था। अंत में वह मामा कोर्ट के पास पहुचा। फिर राज्यपा ल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। वह भी आपत्तिजनक था। उसके बाद उन्होंने यू टर्न लेते हुए उस सिफारिश को वापस ले लिया और फिर मुख्यमंत्री से दुबारा बहुमत साबित करने के लिए कह दिया। यह भी काफी दिलचस्प था। केंद्र सरकार को राच्य सभा में बहुमत प्राप्त नहीं है, इसलिए वह कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लागू करने की जोखिम नहीं उठा सकती थी, इसलिए वह भी कोई साफ साफ निर्णय नहीं ले पा रही है। यही कारण है कि कांग्रेस के केंद्रीय आलाकमान ने अपने आपको इस मसले से अलग कर लिया है और उसने सब कुछ केंद्र सरकार पर छोड़ दिया है। संकट का मूल कारण धनबल है। चुनावों में भी काफी पैसे खर्च किए जाते हैं। चुनाव जीतकर विधायकों के बीच ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की चाह पैदा हो रही है। कुछ विधायकों ने तो साफ साफ कहा कि उन्होंने पाला बदल करने के लिए काफी पैसे मिले हैं। पैसा बांटने का यह खेल सरकार विरोधियों तक ही सीमित नहीं रहा है। जनता दल (एस) के कुछ विधायकों का कहना है कि सरकार के समर्थन के लिए उन्हें भी पैसे की पेशकश की गई। यहां एक दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज्यादा पैसा देने वाला कुछ समय के लिए तो विधायकों का विश्वास हासिल कर सकता है, लेकिन वह हमेशा के लिए उनका विश्वास नहीं पा सकता। कुछ दिन पहले अपने पैसे की ताकत से खनिज माफिया के रूप मे जाने वो रेड्डी बंधु अपनी पार्टी की सरकार को ही गिराने पर तुले हुए थे, पर आज वे उसे बचाने के लिए चिंतित हैं। इसका कारण है कि उनकी आर्थिक हित वर्तमान सरकार के तहत ही सुरक्षित रह सकते हैं, राष्ट्रपति शासन अथवा कांग्रेस सरकार के तहत नहीं। भाजपा सरकार ने दुबारा विश्वासमत हासिल कर लिया है, लेकिन इस सरकार का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखाई देता। इसका कारण है कि भाजपा के अंदर भी अनुशासन नहीं है। मुख्यमंत्री को हटाने के लिए पार्टी की एक लॉबी ही सक्रिय है। धनशक्ति का भूत भी सरकार को हमेशा सताता रहेगा।

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