Sunday, January 16, 2011

सिर्फ रोने से काम नहीं होता

हर जुबां पे कलाम नहीं होता

यूँ तो अब भी बहुत हैं कौशल्यायें

हर कोख में मगर राम नहीं होता

कुछ तो मजबूरी रही होगी

यूँ ही कोई नमकहराम नहीं होता

ये चलकर नहीं रुका करता

समय का कोई विराम नहीं होता

अजय को पत्थर ही समझना लेकिन

हर पत्थर सालिग्राम नहीं होता

Sunday, January 9, 2011

एक आदमी का जिस्म क्या है जिस पे शैदा है जहाँ

एक मिटटी की इमारत एक मिटटी का मकां

खून का गारा बना है ईंट इसकी हड्डियाँ

चाँद सांसों पे टिका है ये खयाले आशियाँ

मौत की पुरजोर आंधी जब इसे टकराएगी

टूटकर सारी इमारत खाक में मिल जाएगी !!

Tuesday, January 4, 2011

जैसे आकाश हो विराट और उसमे हम ढूंढें थोडा सा अवकाश

मगर समय सरगोशी कर कहे अनंत हूँ मै भी इसी आकाश सा

आकाशं का कोई अंत नहीं है और समय का कोई विराम नहीं है

दोनों ही हैं अपनी अपनी अनंत यात्रा पर अनथक

दोनों के ही शब्द कोष रिक्त हैं अवकाश से

Monday, December 27, 2010



वो अमराईयां वो सरसों के खेत ,


वो नदिया किनारे चांदी सी रेत,


वो भौरों का गुंजन वो कोयल का गाना ,


वो द्वारे पे आ के गौ का रम्भाना ,


वो गाँव का पनघट और पीपल की छाँव


बहुत याद आता है अपना वो गाँव। ।

मत पूछो यारो हमसे क्या चीज जवानी है ।

छेड़ो तो नगमा है वर्ना खामोश कहानी है।

उम्र का ऐसा दौर है ये जब दिल बेकाबू होता है,

रोक सका न इसको कोई ये वो दरिया तूफानी है ।

इस तरह अपनी कहानी किसी को बता नहीं ।

खता करके न कहना की हमने खता नहीं ।

पूछे जब कोई क्या रिश्ता है 'अजय' से,

नज़रें झुका के कहना हमको पता नहीं।

जितना प्यार मेरे जीवन का वह सब तुमको दे डाला , जितना खार तेरे जीवन का वह सब मैंने पी डाला

अब रही वेदना सिसक -सिसक तुम उस से सेज सजा लेना , शेष बचे जो खारे आंसू उनसे तेरा तन धो डाला !