अयोध्या स्थित श्रीराम जन्म भूमि के सम्बन्ध में ऐतिहासिक फैसला आ चूका है । भाई लोग फैसले का छिद्रान्वेषण करने में लग चुके है। सभी खुश है और सभी अचंभित भी कि जितना बड़ा हौवा खड़ा किया था वैसा तो कुछ नहीं हुआ । चैनलिया चतुर तो ३० सितम्बर के दिन सुबह से ही कम पैर लगे थे। टी आर पी बढ़ने कि होड़ सी मची थी। जनता ने तो सुबह से ही तय कर लिया था कि ३.३० बजे से पहले हर हाल में घर वापस आ जाना है। एक स्वतंत्र देश के नागरिक के सिर चढ़ कर भय और आतंक ने उसे सहमने पर मजबूर कर दिया। क्यों? १९९२ का मंजर उसे याद रहा और उसने अयोध्या मामले के फैसले के दिन मौन के माध्यम से यह स्पष्ट सन्देश दिया कि अब इस मामले को और उलझाने कि जरुरत नहीं है। यह ठीक है कि माननीय उच्च न्यायालय ने इस मामले के सभी पक्षकारों को निराश नहीं किया है किन्तु इसके वावजूद भी यदि अदालती फैसले के प्रति विरोद्क के स्वर उह्टने लगे। तो यह न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास कि अभिव्यक्ति ही कहा जायेगा। जब आपको अदालत का फैसला नहीं मानना था तो आप अदालत गए ही क्यों थे? प्रश्न सहज ही यह भी स्पष्ट करता कि अब कम से कम राम लला के लिए अपने साथ पडोसी को भी रखने कि जिम्मेदारी निभानी होगी। मन्दिर वही बनायेंगे का नारा लगाने वाले धर्मध्वजा लहराने वाले अब क्या करेंगे क्योकि अब तो रामलला के साथ ठीक उनके बाजू में ही अल्लाह हो अकबर और या इलाही लिल्लैहा कि सदायें भी गूंजेगे। अब तो राम और उनके मानने वालो पर दोहरी जिम्मेदारी आ गयी है। राम ने कभी भी किसी से भी द्वेष नहीं किया। रावन से भी नहीं। तभी तो जब विभीषण को संकोच सहित लंका बुराईका राज्य देने का संकल्प लिया तब कही न कही उनके मन में यह प्रश्न मथ रहा था कि यदि कल रावण भी शरण में आ गया तो उसे क्या दूंगा । पर अगले ही पल सोच लिया कि यदि रावण भी शरण में आ गया तो उसे अवधेश बना दूंगा। लगभग वही स्थिति आ गयी है । फैसले के बहाने मीन मेख निकालने कि कवायद में जुटे लोगो कि शंकाओं कुशंकाओं का कोई अंत नहीं है।सच तो यह है कि इस फैसले ने दोनों पक्षकारों को एक साथ बैठकर यह तय करने का अवसर प्रदान किया है कि अब तीनो पड़ोसियों को किस तरह साथ रहकर आगे बढ़ना है। बिना साथ बैठे औए एक सर्वमान्य सहमति बनाये बिना इस मामले का पताखेप नहीं हो सकता। फिर भी यदि भाई लोग कुछ अतिरिक्त कसरत करना चाहते हैं तो कर लेने में मुझे बुराई नज़र नहीं आती। लेकिन इस कवायद का अर्थ यह भी होगा कि हम इस मामले को सुलझाने कि बजाय यूँ ही उलझाये रखना चाहते है ताकि भविष्य में भी हमारी आने वाली पीढियां इस बेबुनियाद मामले पर उलझी रहें। क्या कभी हमने यह सोचने की कोशिश की कि जिस कालखंड में विवादित मुस्लिम उपासना स्थल के निर्माण कि बात कि जा रही है लगभग उसी कालखंड के आस पास हिंदी के महान संत कवि तुलसीदास ने
विश्व वन्दनीय कृति श्री राम चरित मानस कि रचना कि थी उन्होंने कहीं भी इस घटना का जिक्र नहीं किया है। जैसा कि विवादित स्थल पर मस्जिद बनाने के बारे में सन १५२८ का जिक्र होता है। तुलसी जी का उदहारण देने के मेरे अपने तर्क हैं। अपने समकालीन बादशाह की कुछ जनविरोधी नीतियों का उन्होंने मानस के माध्यम से स्पष्ट विरोध किया । कई उद्धरण मिल जायेंगे । उनके पहले के भी साधू संतों की और से कही कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिलता जिससे यह प्रमाणित होता हो की उस जगह पर बाबर या उसके कहने पर किसी ने मस्जिद बनवाई हो। लगभग ५००-५५० वर्षो का इतिहास है। विश्व में कितने ऐसे वास्तु हैं जो इतने वर्ष के बाद भी बचे हों। फ्हिर श्री राम तो १० हजार से भी अधिक वर्ष पहले हुए थे।उस समय का कोई भी भग्नावशेष अब मौजूद नहीं है। फिर रामजन्मभूमि की वास्तविक स्थिति तय करना बहुत ही कठिन है। इसलिए बेहतर यही है की अब सभी पक्ष अपने अपने अहम् छोड़कर अदालत के फैसले का सम्मान करें और अयोध्या के नाम को सार्थकता प्रदान करें।
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Friday, October 1, 2010
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