Tuesday, November 16, 2010


गया वसंत गयी हरियाली छोड़ गया उपवन को माली
खली वृक्ष खड़े हैं यहाँ अब अपने हाथ पसारे...
फिर मचल उठे दो धारे...
इन्द्र धनुष की छवि से सुंदर , आँखे जैसे नील समुंदर
मन मंदिर में बसी मूर्ति को , अर्पित गीत हमारे ....
फिर मचल उठे दो धारे..

Tuesday, November 9, 2010

ओबामा की यात्रा के मायने

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहली भारत यात्रा को लेकर कूटनीतिक तथा राजनयिक स्तर पर विश्लेषण किये जा रहे हैं और यह पता लगाया जा रहा है कि उनकी यात्रा कितनी सफल रही . दिग्गज अमेरिकी विशेषज्ञों के मुताबिक यह यात्रा भारत-अमेरिकी रिश्तों को एक नए मुकाम पर लेकर जाएगी।

संसद में दिया गया उनका [ओबामा] भाषण वास्तविकता और आदर्शों का बेहतरीन मिश्रण था और उन्होंने सूझबूझ के साथ इस बात को साबित किया कि वह व्यक्तिगत रूप से भारत पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं और अमेरिका के लिए भारत-अमेरिकी रिश्ते बेहद महत्वपूर्ण हैं।

शंकाएं गलत साबित हुईं। इतिहासकार इस यात्रा को परिपक्वता और एकजुटता के लिए एक मील के पत्थर के रूप में देखेंगे जिसे राष्ट्रपति ओबामा ने 21वीं सदी की निर्णायक भागीदारी बताया हैं।

एक सरसरी नज़र से देखने पर कहा जा सकता है कि भारत-अमेरिकी रिश्तों को और मजबूत करने की दिशा में ओबामा की यात्रा सफल रही और यह दोनों देशों के संबंधों को नए मुकाम पर लेकर जाएगी।

इस यात्रा ने उनके प्रशासन का भारत के साथ जुडाव के महत्व को स्पष्ट किया जिसमें आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को रेखांकित किया गया। भारत की वैश्विक भूमिका को और बढ़ाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं, जिसमें भारतीय संगठनों पर निर्यात नियंत्रणों में ढील और अप्रसार से जुड़े संगठनों जैसे परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह [एनएसजी] में भारत की सदस्यता का समर्थन शामिल है।सबसे महत्वपूर्ण है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के दावे को समर्थन। वैसे इस समर्थन को फ़िलहाल प्रतीकात्मक' कहा जा सकता है। क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के बारे में समर्थन वास्तविकता से बहुत दूर है। दक्षिण एशियाई मामलों के प्रसिद्ध विशेषज्ञ स्टीफेन पी.कोहेन का कहना है कि भारत की स्थायी सदस्यता की बात 'प्रतीकात्मक' अधिक है। यह संकेत ही भारतीय मीडिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गया है।उनका मानना है कि संयुक्त राष्ट्र का सुधार एक बहुत बड़ा काम है। 'वूडरो विल्सन सेंटर' के रॉबर्ट हेथवे का कहना है कि सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत का समर्थन करना महत्वपूर्ण तो है, परंतु यह केवल संकेतात्मक है। दूसरी ओर अमेरिकी सांसदों ने भारत को इस संबंध में समर्थन का स्वागत किया है। उनका मानना है कि इस विश्व संस्था में 21वीं सदी की झलक मिलनी चाहिए। भारत विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ओबामा का समर्थन अमेरिका के एक निकट सहयोगी को मजबूती प्रदान करने का प्रयास है। भारत विश्व में दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला राष्ट्र है और यह वैश्विक सुरक्षा की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण देश है। इसे सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता देना तर्कपूर्ण है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा अपनी पहली भारत यात्रा में उसे अमेरिका का अपरिहार्य सहयोगी करार दिए जाने के बाद अब उनके पूर्ववर्ती जार्ज डब्ल्यू बुश ने भी स्वीकार किया है कि भारत में अमेरिका के करीबी सहयोगियों में शामिल होने का माद्दा है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश ने अपनी पुस्तक 'डिसीजन प्वाइंट्स' में कहा कि मेरा मानना है कि एक अरब की आबादी और शिक्षित मध्यम वर्ग वाले भारत में अमेरिका का करीबी सहयोगी बनने की संभावना है। भारत- अमेरिका संबंध को नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाले और भारत के साथ नागरिक परमाणु समझौते में अहम भूमिका निभाने वाले बुश ने कहा कि यह समझौता विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच रिश्ते बेहतर करने के प्रयासों की परिणति है। परमाणु समझौता एक ऐतिहासिक कदम था क्योंकि इसने वैश्विक स्तर पर भारत की नई भूमिका के संकेत दिए। साथ ही बुश का यह भी मानना है कि इस समझौते से जाहिर तौर पर पाकिस्तान में चिंताएं बढ़ीं।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की यात्रा से उत्साहित भारत के लिए यह समय अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर गंभीरता से विचार करने का है। इस तरह का समझौता आसियान तथा दक्षिण कोरिया के साथ किया जा चुका है।
व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते के लिए बातचीत पर गंभीरता से विचार करना चाहिए जिसमें व्यापार, निवेश तथा सेवाएं शामिल हों। हमें इसका उपयोग नीवं के रूप में करना चाहिए। लेकिन, इस तरह के फैसलों के लिए व्यापार बातचीत की जरूरत होगी और ऐसे कदम सोच समझकर उठाए जाने चाहिए। निसंदेह यह सब इस कमरे में आज ही होने से रहा। भारत अमेरिका का व्यापार 2009-10 में 36।6 अरब डालर रहा था। जहा तक ओबामा की कूटनीति का प्रश्न है ,वे सफल रहे हैं। तीव्र आर्थिक मंदी से जूझ रहे अपने देश को रास्ते पे लाना उनकी प्राथमिकता है। इसलिए जब ओबामा अपने देशवासियों के लिए ५० हज़ार नौकरियां जुटाने का दावा करते हैं तब वे निश्चित ही किसी कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी नज़र आते हैं।

ओबामा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता पर अपने समर्थन को अंतिम समय तक रहस्य बनाए रखा ८ अक्टूबर को भारतीय संसद को संबोधित करने से खड़े होने से कुछ मिनट पहले तक उन्होंने ने इस मामले में भारत को समर्थन देने की अपनी घोषणा के बारे में गोपनीयता बरकरार रखी थी। ओबामा ने अपने इस कदम को अंतिम समय तक अपने दिल में छिपाए रखा। संसद में उनका संबोधन शुरू होने से कुछ मिनट पहले तक किसी को यह पता नहीं था कि ओबामा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के मामले में अपने समर्थन की घोषणा करने वाले हैं।
लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन को जवाब देने के लिए यह घोषणा की है। इससे पता चलता है कि अमेरिका, भारत के साथ अपने आर्थिक और रक्षा संबंधों को और मजबूती देना चाहता है। हालांकि, यह अभी तक तय नहीं है कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता कब तक मिलेगी। न ही पेशकश में यह गारंटी दी गई है कि भारत को सदस्यता मिलेगी ही।
ओबामा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लिए भारत को समर्थन चीन को जवाब देने के लिए किया है। ओबामा का यह कदम चीन को जवाब है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए भारत को समर्थन से राष्ट्रपति ने यह संकेत दे दिया है कि अमेरिका दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच भागीदारी को और ऊंचाई पर ले जाना चाहता है। साथ ही वह भारत के साथ व्यावसायिक रिश्तों को मजबूती देना चाहता है और चीन को जवाब देना चाहता है।
ज़ाहिर है की इस कदम से चीन में नई चिंताएं पैदा हो सकती हैं। यह अमेरिका के उन प्रयासों का भी संकेत है कि चीन की बढ़ती ताकत के बीच अमेरिका एशियाई देशों से अपने गठजोड़ को और मजबूत करना चाहता है।
वैसे भारत को 55 साल पहले 1955 में भी स्थाई सदस्यता की पेशकश की गई थी। उस समय अमेरिका और सोवियत संघ ने भारत को यह पेशकश की थी, पर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस पेशकश को ठुकरा दिया था। नेहरू ने कहा था कि भारत के बजाय यह सीट चीन को दे दी जाए।
ओबामा की यह प्रतिबद्धता भारत के नए अंतरराष्ट्रीय दर्जे की दिशा में सिर्फ एक कदम है।

Monday, November 1, 2010

अब किस पे करें भरोसा

इसी रविवार को मुंबई स्थित एक चेनल के ऑफिस में गया। एक मित्र का आग्रह था कि ब्यूरो चीफ कि जगह खाली है आ जाओ । अपन भी इलेक्ट्रोनिक मिडिया का कीड़ा शांत करने के इरादे से उधर चले गए। मगर उस दफ्तर में पत्रकारिता का जो वीभत्स रूप मुझे दिखाई दिया वह मेरे लिए एक भयावह अनुभव था । चैनल के एक अफसर को खबर से ज्यादा इस बात में रूचि थी कि कौन सा बिल्डर कहा क्या घपला कर रहा है । साहब ने बाकायदा एक फाइल बना राखी है जिसमे शहर भर में चलनेवाले तमाम निर्माण कार्यों विशेषकर भवन निर्माण कि अच्छी खासी जानकारी जुटा कर रखी हुयी थी। इशारा साफ़ था कि यहाँ खबर का मतलब तोडपानी है । पत्रकारिता से भाई लोगों को कोई लेना देना नहीं था न है। शायद यही कारण रहा होगा कि मेरे एक मित्र वहां एक महिना भी पूरा किये बगैर ही छोड़ दिया है। सवाल यह है कि पत्रकारिता का यह कौन सा तेवर है जिसमे पत्रकार को एक हफ्ताखोर बना कर बाज़ार में उतारा जा रहा है । मेरे पूर्व नियोक्ता भी पत्रकारों को दलाई के धंधे में उतर दिया है। हाँ जब भी आप उनसे मिलोगे तो पत्रकारिता के आदर्शवाद पर पूरा भाषण झड देंगे। लगेगा कि इनसे बड़ा महान पत्रकार कोई नहीं है। लेकिन कथनी और करनी में एकदम विरोधाभास है। यदि आप पत्रकार हैं और स्वाभिमान जैसे रोग से पीड़ित है तो कृपया अपने आदर्शवाद को घर ही छोड़ दें और हाथ में कटोरा ले भीख अर्थात विज्ञापन मांगने का अभ्यास करें वर्ना आज कि पत्रकारिता में आप अप्रासंगिक हो जायेंगे ठीक मेरी तरह। दलाली सीख लो, दुनियाभर के छल कपट को अपना स्वाभाव बना लो, दूसरे की जेब काटने का फन सीख लो । बहरहाल अपन निराश नहीं हैं .निश्चित ही यह स्थिति ज्यादा दिन तक चलने वाली नहीं है। लोग ऐसे पत्रकारों को यथोच्य ढंग से निपटेंगे । लेकिन इस बीमारी का हल अपने पत्रकार समाज को ही खोजना होगा। हमें अपने भीतर झांकना होगा की इस स्थिति के लिए कहीं हम खुद ही तो जिम्मेदार नहीं हैं? आज पत्रकारों में भी दिखावे की जो प्रवृत्ति बढ़ी है वही आज की पत्रकारिता को भ्रष्ट कर रही है। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या देना चाहेंगे ? जिस दिन इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर ढूँढने का प्रयास होगा , पत्रकारिता सुधर जाएगी।

Thursday, October 28, 2010

किसका डर है सरकार को

बधाई हो !सरकार ने कश्मीर के कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी और सामाजिक कार्यकर्ता अरूंधति राय के कथित देश विरोधी भाषणों को लेकर उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कराने का किया है ।
इन दोनों लोगों ने पिछले हफ्ते यहां एक सेमिनार में कथित तौर पर देश विरोधी भाषण दिया था।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बताया है कि विभिन्न मुद्दों पर विचार करने के बाद यह फैसला किया गया। यह निर्णय लिया गया कि इस तरह के किसी कदम उन्हें अनावश्यक प्रचार मिलेगा और घाटी में अलगाववादियों को एक मौका मिलेगा।
उन्होंने बताया कि हमने उन्हें नजरअंदाज करने का फैसला किया है।
गिलानी और अन्य लोगों ने 21 अक्तूबर को यह बयान दिए थे, जिसे अलगाववाद को तूल देने की कोशिश के रूप में देखा गया। गृहमंत्रालय ने इस मुद्दे पर कानूनी राय मांगी थी, जिसमें यह सुझाव दिया गया कि आईपीसी की धारा 124 [ए] [देशद्रोह] के तहत एक मामला दर्ज किया जा सकता है।
मंत्रालय ने राजनीतिक राय लेने के बाद गिलानी और राय के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कराने का फैसला किया। 'आजादी- एक मात्र रास्ता' विषय पर आयोजित सम्मेलन में गिलानी, लेखिका अरूंधति और माओवाद समर्थक नेता वार वरा राव शामिल हुए थे। श्रोता गिलानी के भाषण पर भड़क गए और एक व्यक्ति ने उनपर जूता फेंक दिया। सवाल यहं है किसे किसे नज़रंदाज़ करोगे? यह देश है या कोई धरमशाला जहाँ जब चाहे कोई आये और कुछ भी बक कर चला जाये! सरकार कह रही है की इससे उनको अनावश्यक प्रचार मिलेगा .बड़ा ही मासूम सा तर्क है यह। कितना अजीब है कि जिस प्रचार न देने से सरकार कतरा रही है उससे ज्यादा प्रचार तो भाई और बाई को वैसे ही मिल गया है। फिर अरुंधती और गिलानी के साथ इतनी नरमी का अर्थ ? तब तो हमें पकिस्तान में बैठे देश के दुश्मनों की भी बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए। ऐसा लगता है कि सरकार को किसी अदृश्यशक्ति का भय है। यह अदृश्य शक्ति कौन है। देश के तथाकथित प्रगतिवादी जिन्हें हर उस काम में सुख मिलता है जिसमें देश का नुकसान होता हो। सय्यद अली शाह कि साड़ी उम्र भारत विरोध में बीती है। इसी बिना पर यह शख्श अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सभी सुविधाएँ भी भोग रहा है। समझ में नहीं आता आस्तीन में ऐसे दोस्त किस हेतु पाले जा रहे हैं?

Wednesday, October 27, 2010

इस वार्ता का मतलब ?

जम्मू-कश्मीर पर वार्ता प्रक्रिया को बढ़ाने के लिए छोटे-छोटे कदमों की वकालत करते हुए केंद्रीय वार्ताकारों ने कहा है कि राज्य में सभी विचारों के लोगों से बातचीत करने के अतिरिक्त उनके पास देश में सभी पक्षों को विश्वास में लेने की एक बड़ी जिम्मेदारी है।
यदि देश के राजनीतिक मत का नेतृत्व करने वाली संसद को विश्वास में नहीं लिया जाता तो प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। यह एक बड़ा दायित्व है, लेकिन इसे किया जाना है। समग्र और स्थाई समाधान ढूंढ़ने के प्रयास के तहत कश्मीर में समाज के विभिन्न तबकों के साथ बातचीत में वार्ताकार दल ने कश्मीर पर राजनीतिक मतों को सुना और लोगों के सामने रोजाना आने वाली स्वतंत्र होकर न घूम पाने या बच्चों के लिए दूध न मिल पाने जैसी समस्याओं के बारे में भी जाना। अपना मानना है कि टीम के राज्य के पहले दौरे के बाद किसी को भी बड़े कदमों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए । यह समूह राज्य में स्थिति में सुधार के लिए केंद्र को सिफारिश करेगा। राज्य में हालत सुधारने के लिए तत्काल राजनीतिक बंदियों, पथराव करने वालों की रिहाई और क‌र्फ्यू हटाना शीर्ष प्राथमिकताओं में है। ध्यान रहे कि संसद द्वारा पारित एक प्रस्ताव [जम्मू कश्मीर के पाकिस्तानी कब्जे वाले हिस्से को वापस लेने के लिए] पाकिस्तान को एक पार्टी बना देता है। आदर्श रूप से कश्मीर मुद्दे का समाधान पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र सहित राज्य के सभी भागों के लोगों का स्वीकार्य होना चाहिए।
वहीं, कश्मीर के लिए केंद्र द्वारा नियुक्त वार्ताकार जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 2000 में पारित स्वायत्तता संकल्प के मुद्दे पर भाजपा नेतृत्व किस तरह की धारणा रखता है यह जानना भी जरुरी है । क्योंकि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने उसे खारिज कर दिया था। इस संकल्प के ख़ारिज होने की वजह भी सार्वजनिक होनी चाहिए। उस समय विधानसभा में नेशनल कांफ्रेंस को करीब दो-तिहाई बहुमत हासिल था और सदन ने जुलाई 2000 में वह संकल्प पारित किया था, लेकिन केंद्र सरकार ने उसे खारिज कर दिया था, जबकि नेशनल कांफ्रेंस उस समय राजग सरकार में शामिल थी।
फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा 2006 में गठित पांच कार्यकारी समूह की सिफारिशों की कार्रवाई रिपोर्ट [एटीआर] का क्या हुआ देश यह भी जानना चाहेगा .यहाँ ये सब सन्दर्भ गिनाने का खास मकसद है। वह यह कि क्या कश्मीर के लिए नियुक्त वार्ताकारों को उपरोक्त सभी बातों से परिचित करा दिया गया था? यदि हाँ तो वे जानकारियां क्या है और यदि नहीं तो क्यों? सरसरी दृष्टी से देखने पर लगता है कि कश्मीर पर बातचीत के लिए आधी अधूरी जानकारी के साथ वार्ताकार वहां भेजे गए। वे किससे बात करेंगे और बात चीत का मसौदा कैसे व कौन तय करेगा तथा उस की वैधता व विश्वसनीयता , स्वीकार्यता , सन्दर्भ , संकल्पना, सार्थकता एवं सर्व ग्राह्यता के मान दंड क्या हैं /होंगे कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर दिया जाना चाहिए।

Saturday, October 23, 2010

इतनी छूट क्यों?


आखिर भाई लोग चाहते क्या हैं ? साथ ही साथ हमारे देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार की मंशा क्या है? जम्मू कश्मीर के अलगाव वादी नेता और डेढ़ सयाने बुद्धिजीवी दिल्ली में मजमा लगाकर देश और संविधान के खिलाफ जहर उगलते रहें और देश के कर्णधार उनके भाषणों की सीडी देखने के बाद कुछ करने या न करने की बात करें तो इस विडम्बना पर रोने के सिवा हम और आप क्या कर सकते है? लेकिन इस रोने धोने से कुछ होने वाला नहीं है.क्योंकि दिल्ली की गद्दी पर बैठे सत्ताधीश देश और संविधान को लेकर इतने गंभीर है ही नहीं। वर्ना जब अलगाववादी देश की राजधानी में राष्ट्रद्रोह को बढ़ावा देने का काम कर रहे थे, तब केंद्र सरकार कार्रवाई करने के बजाय हाथ पर मूकदर्शक बनी क्यों बैठी रही। ध्यान रहे की संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
अलगाववादियों ने सरकार की नाक के ठीक नीचे राष्ट्रद्रोह को बढ़ावा देने के लिए एक सम्मेलन आयोजित किया। इसमें कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ नक्सलियों व खालिस्तान समर्थकों ने भी देश की एकता व अखंडता के खिलाफ जमकर जहर उगला। इस घटना से पूरा देश स्तब्ध है लेकिन यह बेहद आश्चर्यजनक है कि सब कुछ जानने-समझने के बावजूद केंद्र सरकार चुपचाप देखती रही। मूकदर्शक बनी रही । यह देश को मंजूर नहीं है और होना भी नहीं चाहिए।
हुर्रियत नेता गिलानी की कश्मीरियत की परिभाषा कश्मीर के लोगों व वहां की संस्कृति से एकदम अलग है। गिलानी लोगों को सिर्फ नफरत सिखा रहे हैं। इस समस्या का तानाबाना भले ही सरहद पार बुना जाता हो, लेकिन दिल्ली की सरकार भी कम नहीं है। यहां पर कश्मीर समस्या एक उद्योग बन गई है। राजनीतिक वर्ग ने बेहद निकम्मेपन का सबूत दिया है। कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला व उनके पिता केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला को किसने आगे बढ़ाया है? आखिरकार राजनीति में चंद खानदान ही नजर क्यों आते हैं। देश के वफादार की जगह निजी वफादार से राजनीति चले, इस सोच से यह सब हो रहा है।
अब जरा



हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के बयां को भी देखें। गिलानी ने कश्मीर पर नियुक्त किए गए केंद्र सरकार के वार्ताकारों को फिजूल बताते हुए इनका बहिष्कार करने की घोषणा कर दी उनहोंने केंद्र सरकार के इस कदम को फरेबकारी बताते हुए सिर्फ समय टालने वाला कवायद बताया । उनकी आवाज में आवाज मिलाते हुए लेखिका अरुंधति राय भी कह गयी कि कश्मीर कभी भारत का अभिन्न अंग रहा ही नहीं। उन्होंने भारत को उपनिवेशवादी भी बताया।
गिलानी ने राजधानी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने जो वार्ताकार नियुक्त किए हैं, उनका राज्य के सभी गुटों को बहिष्कार करना चाहिए। ये वार्ताकार वहां जा कर क्या करेंगे। यह तो सभी को मालूम है कि राज्य की जनता क्या चाहती है। घाटी ही नहीं, बल्कि जम्मू और लद्दाख के लोगों को हिंदुस्तान के बलपूर्वक कब्जे से आजादी चाहिए। गिलानी के मुताबिक सिर्फ मुसलमान ही नहीं, राज्य के हिंदू और सिखों को भी आत्म निर्णय का हक चाहिए। इसका पता करने के लिए किसी वार्ताकार की जरूरत नहीं है। यह सिर्फ समय बिताने की फरेबकारी कवायद है।
राजनीतिक कैदियों की आजादी के लिए समिति' की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन संसद पर हमले के आरोप से बरी हो चुके एसएआर. गिलानी ने किया। इसी मौके पर लेखिका अरुंधति राय ने भी अलगाववादियों के पक्ष में जम कर तर्क दिए। इन अलगाववादी आंदोलनों को उन्होंने जन-आंदोलन बताया। साथ ही कहा कि कश्मीर को बार-बार भारत का अभिन्न अंग बताया जाता है, जबकि यह कभी अभिन्न अंग रहा ही नहीं। उनहोंने कहा कि चाहे कश्मीर के आंदोलनकारी हों या नगालैंड के या फिर नक्सली, ये जन आंदोलन हैं। इसलिए इनकी आवाज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहिए। वैसे तो विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन भी जन आंदोलन है, लेकिन इसमें फर्क यह है कि यह 'सबके लिए न्याय' के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, जबकि अलगाववादी बताए जाने वाले ये आंदोलन इस भावना पर आधारित हैं। अब इन लेखिका से पूछा जाना चाहिए कि सीमा पर कि मदद से चलाये जा रहे देश विरोधी अभियान को जन आन्दोलन कैसे कहा जा सकता है? मैडम अयून्धाती राय का सारा चितन अभिजात्य सोच पर आधारित है। वे उस वर्ग की लेखिका है जो इस भारत गणराज्य की गरीबी पर पंचतारा होटलों में बैठकर वाग्विलास करते है। देश की जमीनी सच्चाई का उनको जरा भी अहसास नहीं है। गिलानी किस मुह से कश्मीर के हिन्दुओं की बात कर सकते है । खासकर तब जब कि लाखो कश्मीरी पंडित अब भी दिल्ली और आस पास खानाबदोशों कि जिंदगी जी रहे हों। अरुंधती राय ने भोग ही क्या है? नक्सली हिंसा में जो निरपराध मारे गए उनका दोष क्या था? यह किस तरह का जन आन्दोलन है जिसमे जन से ज्यादा गन ( बन्दूक) कि आवाज़ सुने पड़ती है। मैडम राय खुलेआम देशद्रोह का महिमा मंडन कर रही थी और देश कि कठपुतली सरकार मौन थी। यह बेहद शर्मनाक है। विहिप के आन्दोलन की तुलना कश्मीरी आतंक वादियों से करना मानसिक दिवालियापन ही कहा जा सकता है। क्या एक परिपक्व लोकतंत्र का अर्थ यह है कि जिसके मन में जो आये बक दे। इस तरफ भी विचार होना चाहिए।

Friday, October 22, 2010

कर्नाटक का नाटक


कर्नाटक का यह राजनैतिक ड्रामा गोवा और झारखंड में हो चुके नाटक की पुनरावृत्ति ही है। सवा ल उठता है कि लोकतंत्र कैसे काम करेगा, यदि इसके रक्षक ही भक्षक बनने पर उतारू हो जाएं? यहां तो विधायक से लेकर मंत्री तक और स्पीकर से लेकर गवर्नर तक सभी अपने अपने हिसाब से खेल खेलने लगे हैं और ऐसा करते समय नियमों और कायदों को अंगूठा दिखाने लगे हैं। ऐसी हालत में अदालत का ही आसरा रह जाता है। राज्यपाल का उत्साह तो इस खेल में देखते बन रहा था। उन्होंने आनन फानन में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। जब केंद्र की सरकार ने उस सिफारिश को गर्मजोशी से नहीं लिया तो फिर राज्य सरकार को दुबारा विश्वास मत हासिल करने को कह दिया। जिन विधायकों को स्पीकर ने विधानसभा की सदस्यता से बर्खास्त कर दिया, वे अदालत की शरण में चले गए और अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रखकर और फैसले का दिन आगे खिसकाकर भ्रम को और भी बढ़ाने का काम किया। यह बहुत ही शर्मनाक है कि विधायकों को रिजॉर्ट में ताला लगाकर बंद रखा गया। उन्हें जेट विमानों और हेलिकॉप्टरों की सहायता से पड़ोसी राज्यों मे ले जाया गया। पांच सितारा होटलों में ठहराया गया। यदि इस तरह की घटनाएं घटती हैं, तो फिर सदन में बहुमत परीक्षण की जांच निष्पक्षता से कैसे हो सकती है? एक पूर्व मुख्यमंत्री डी कुमारस्वामी दूसरी पार्टी के विधायकों को भेड़ की तरह दूसरे राज्यों में ले जाते दिखाई दिए और लोकलाज को दरकिनार कर दूसरी पार्टी के असंतुष्ट विधायकों के प्रवक्ता की तरह बोते नजर आए। कांग्रेस का खेल भी इस प्रकरण में गंदा रहा। मुख्यमंत्री ने जिस तरह से सोमवार को विधानसभा में विश्वासमत हासिल किया वह तरीका अनेक सवाल पैदा कर रहा था। स्पीकर ने जिस तरह से भाजपा के असंतुष्ट विधायकों और निर्दलीयों की सदस्यता समाप्त की वह भी कई लोगों को समझ में नहीं आ रहा था। अंत में वह मामा कोर्ट के पास पहुचा। फिर राज्यपा ल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। वह भी आपत्तिजनक था। उसके बाद उन्होंने यू टर्न लेते हुए उस सिफारिश को वापस ले लिया और फिर मुख्यमंत्री से दुबारा बहुमत साबित करने के लिए कह दिया। यह भी काफी दिलचस्प था। केंद्र सरकार को राच्य सभा में बहुमत प्राप्त नहीं है, इसलिए वह कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लागू करने की जोखिम नहीं उठा सकती थी, इसलिए वह भी कोई साफ साफ निर्णय नहीं ले पा रही है। यही कारण है कि कांग्रेस के केंद्रीय आलाकमान ने अपने आपको इस मसले से अलग कर लिया है और उसने सब कुछ केंद्र सरकार पर छोड़ दिया है। संकट का मूल कारण धनबल है। चुनावों में भी काफी पैसे खर्च किए जाते हैं। चुनाव जीतकर विधायकों के बीच ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की चाह पैदा हो रही है। कुछ विधायकों ने तो साफ साफ कहा कि उन्होंने पाला बदल करने के लिए काफी पैसे मिले हैं। पैसा बांटने का यह खेल सरकार विरोधियों तक ही सीमित नहीं रहा है। जनता दल (एस) के कुछ विधायकों का कहना है कि सरकार के समर्थन के लिए उन्हें भी पैसे की पेशकश की गई। यहां एक दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज्यादा पैसा देने वाला कुछ समय के लिए तो विधायकों का विश्वास हासिल कर सकता है, लेकिन वह हमेशा के लिए उनका विश्वास नहीं पा सकता। कुछ दिन पहले अपने पैसे की ताकत से खनिज माफिया के रूप मे जाने वो रेड्डी बंधु अपनी पार्टी की सरकार को ही गिराने पर तुले हुए थे, पर आज वे उसे बचाने के लिए चिंतित हैं। इसका कारण है कि उनकी आर्थिक हित वर्तमान सरकार के तहत ही सुरक्षित रह सकते हैं, राष्ट्रपति शासन अथवा कांग्रेस सरकार के तहत नहीं। भाजपा सरकार ने दुबारा विश्वासमत हासिल कर लिया है, लेकिन इस सरकार का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखाई देता। इसका कारण है कि भाजपा के अंदर भी अनुशासन नहीं है। मुख्यमंत्री को हटाने के लिए पार्टी की एक लॉबी ही सक्रिय है। धनशक्ति का भूत भी सरकार को हमेशा सताता रहेगा।