बधाई हो !सरकार ने कश्मीर के कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी और सामाजिक कार्यकर्ता अरूंधति राय के कथित देश विरोधी भाषणों को लेकर उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कराने का किया है ।
इन दोनों लोगों ने पिछले हफ्ते यहां एक सेमिनार में कथित तौर पर देश विरोधी भाषण दिया था।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बताया है कि विभिन्न मुद्दों पर विचार करने के बाद यह फैसला किया गया। यह निर्णय लिया गया कि इस तरह के किसी कदम उन्हें अनावश्यक प्रचार मिलेगा और घाटी में अलगाववादियों को एक मौका मिलेगा।
उन्होंने बताया कि हमने उन्हें नजरअंदाज करने का फैसला किया है।
गिलानी और अन्य लोगों ने 21 अक्तूबर को यह बयान दिए थे, जिसे अलगाववाद को तूल देने की कोशिश के रूप में देखा गया। गृहमंत्रालय ने इस मुद्दे पर कानूनी राय मांगी थी, जिसमें यह सुझाव दिया गया कि आईपीसी की धारा 124 [ए] [देशद्रोह] के तहत एक मामला दर्ज किया जा सकता है।
मंत्रालय ने राजनीतिक राय लेने के बाद गिलानी और राय के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कराने का फैसला किया। 'आजादी- एक मात्र रास्ता' विषय पर आयोजित सम्मेलन में गिलानी, लेखिका अरूंधति और माओवाद समर्थक नेता वार वरा राव शामिल हुए थे। श्रोता गिलानी के भाषण पर भड़क गए और एक व्यक्ति ने उनपर जूता फेंक दिया। सवाल यहं है किसे किसे नज़रंदाज़ करोगे? यह देश है या कोई धरमशाला जहाँ जब चाहे कोई आये और कुछ भी बक कर चला जाये! सरकार कह रही है की इससे उनको अनावश्यक प्रचार मिलेगा .बड़ा ही मासूम सा तर्क है यह। कितना अजीब है कि जिस प्रचार न देने से सरकार कतरा रही है उससे ज्यादा प्रचार तो भाई और बाई को वैसे ही मिल गया है। फिर अरुंधती और गिलानी के साथ इतनी नरमी का अर्थ ? तब तो हमें पकिस्तान में बैठे देश के दुश्मनों की भी बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए। ऐसा लगता है कि सरकार को किसी अदृश्यशक्ति का भय है। यह अदृश्य शक्ति कौन है। देश के तथाकथित प्रगतिवादी जिन्हें हर उस काम में सुख मिलता है जिसमें देश का नुकसान होता हो। सय्यद अली शाह कि साड़ी उम्र भारत विरोध में बीती है। इसी बिना पर यह शख्श अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सभी सुविधाएँ भी भोग रहा है। समझ में नहीं आता आस्तीन में ऐसे दोस्त किस हेतु पाले जा रहे हैं?
Thursday, October 28, 2010
Wednesday, October 27, 2010
इस वार्ता का मतलब ?
जम्मू-कश्मीर पर वार्ता प्रक्रिया को बढ़ाने के लिए छोटे-छोटे कदमों की वकालत करते हुए केंद्रीय वार्ताकारों ने कहा है कि राज्य में सभी विचारों के लोगों से बातचीत करने के अतिरिक्त उनके पास देश में सभी पक्षों को विश्वास में लेने की एक बड़ी जिम्मेदारी है।
यदि देश के राजनीतिक मत का नेतृत्व करने वाली संसद को विश्वास में नहीं लिया जाता तो प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। यह एक बड़ा दायित्व है, लेकिन इसे किया जाना है। समग्र और स्थाई समाधान ढूंढ़ने के प्रयास के तहत कश्मीर में समाज के विभिन्न तबकों के साथ बातचीत में वार्ताकार दल ने कश्मीर पर राजनीतिक मतों को सुना और लोगों के सामने रोजाना आने वाली स्वतंत्र होकर न घूम पाने या बच्चों के लिए दूध न मिल पाने जैसी समस्याओं के बारे में भी जाना। अपना मानना है कि टीम के राज्य के पहले दौरे के बाद किसी को भी बड़े कदमों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए । यह समूह राज्य में स्थिति में सुधार के लिए केंद्र को सिफारिश करेगा। राज्य में हालत सुधारने के लिए तत्काल राजनीतिक बंदियों, पथराव करने वालों की रिहाई और कर्फ्यू हटाना शीर्ष प्राथमिकताओं में है। ध्यान रहे कि संसद द्वारा पारित एक प्रस्ताव [जम्मू कश्मीर के पाकिस्तानी कब्जे वाले हिस्से को वापस लेने के लिए] पाकिस्तान को एक पार्टी बना देता है। आदर्श रूप से कश्मीर मुद्दे का समाधान पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र सहित राज्य के सभी भागों के लोगों का स्वीकार्य होना चाहिए।
वहीं, कश्मीर के लिए केंद्र द्वारा नियुक्त वार्ताकार जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 2000 में पारित स्वायत्तता संकल्प के मुद्दे पर भाजपा नेतृत्व किस तरह की धारणा रखता है यह जानना भी जरुरी है । क्योंकि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने उसे खारिज कर दिया था। इस संकल्प के ख़ारिज होने की वजह भी सार्वजनिक होनी चाहिए। उस समय विधानसभा में नेशनल कांफ्रेंस को करीब दो-तिहाई बहुमत हासिल था और सदन ने जुलाई 2000 में वह संकल्प पारित किया था, लेकिन केंद्र सरकार ने उसे खारिज कर दिया था, जबकि नेशनल कांफ्रेंस उस समय राजग सरकार में शामिल थी।
फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा 2006 में गठित पांच कार्यकारी समूह की सिफारिशों की कार्रवाई रिपोर्ट [एटीआर] का क्या हुआ देश यह भी जानना चाहेगा .यहाँ ये सब सन्दर्भ गिनाने का खास मकसद है। वह यह कि क्या कश्मीर के लिए नियुक्त वार्ताकारों को उपरोक्त सभी बातों से परिचित करा दिया गया था? यदि हाँ तो वे जानकारियां क्या है और यदि नहीं तो क्यों? सरसरी दृष्टी से देखने पर लगता है कि कश्मीर पर बातचीत के लिए आधी अधूरी जानकारी के साथ वार्ताकार वहां भेजे गए। वे किससे बात करेंगे और बात चीत का मसौदा कैसे व कौन तय करेगा तथा उस की वैधता व विश्वसनीयता , स्वीकार्यता , सन्दर्भ , संकल्पना, सार्थकता एवं सर्व ग्राह्यता के मान दंड क्या हैं /होंगे कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर दिया जाना चाहिए।
यदि देश के राजनीतिक मत का नेतृत्व करने वाली संसद को विश्वास में नहीं लिया जाता तो प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। यह एक बड़ा दायित्व है, लेकिन इसे किया जाना है। समग्र और स्थाई समाधान ढूंढ़ने के प्रयास के तहत कश्मीर में समाज के विभिन्न तबकों के साथ बातचीत में वार्ताकार दल ने कश्मीर पर राजनीतिक मतों को सुना और लोगों के सामने रोजाना आने वाली स्वतंत्र होकर न घूम पाने या बच्चों के लिए दूध न मिल पाने जैसी समस्याओं के बारे में भी जाना। अपना मानना है कि टीम के राज्य के पहले दौरे के बाद किसी को भी बड़े कदमों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए । यह समूह राज्य में स्थिति में सुधार के लिए केंद्र को सिफारिश करेगा। राज्य में हालत सुधारने के लिए तत्काल राजनीतिक बंदियों, पथराव करने वालों की रिहाई और कर्फ्यू हटाना शीर्ष प्राथमिकताओं में है। ध्यान रहे कि संसद द्वारा पारित एक प्रस्ताव [जम्मू कश्मीर के पाकिस्तानी कब्जे वाले हिस्से को वापस लेने के लिए] पाकिस्तान को एक पार्टी बना देता है। आदर्श रूप से कश्मीर मुद्दे का समाधान पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र सहित राज्य के सभी भागों के लोगों का स्वीकार्य होना चाहिए।
वहीं, कश्मीर के लिए केंद्र द्वारा नियुक्त वार्ताकार जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 2000 में पारित स्वायत्तता संकल्प के मुद्दे पर भाजपा नेतृत्व किस तरह की धारणा रखता है यह जानना भी जरुरी है । क्योंकि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने उसे खारिज कर दिया था। इस संकल्प के ख़ारिज होने की वजह भी सार्वजनिक होनी चाहिए। उस समय विधानसभा में नेशनल कांफ्रेंस को करीब दो-तिहाई बहुमत हासिल था और सदन ने जुलाई 2000 में वह संकल्प पारित किया था, लेकिन केंद्र सरकार ने उसे खारिज कर दिया था, जबकि नेशनल कांफ्रेंस उस समय राजग सरकार में शामिल थी।
फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा 2006 में गठित पांच कार्यकारी समूह की सिफारिशों की कार्रवाई रिपोर्ट [एटीआर] का क्या हुआ देश यह भी जानना चाहेगा .यहाँ ये सब सन्दर्भ गिनाने का खास मकसद है। वह यह कि क्या कश्मीर के लिए नियुक्त वार्ताकारों को उपरोक्त सभी बातों से परिचित करा दिया गया था? यदि हाँ तो वे जानकारियां क्या है और यदि नहीं तो क्यों? सरसरी दृष्टी से देखने पर लगता है कि कश्मीर पर बातचीत के लिए आधी अधूरी जानकारी के साथ वार्ताकार वहां भेजे गए। वे किससे बात करेंगे और बात चीत का मसौदा कैसे व कौन तय करेगा तथा उस की वैधता व विश्वसनीयता , स्वीकार्यता , सन्दर्भ , संकल्पना, सार्थकता एवं सर्व ग्राह्यता के मान दंड क्या हैं /होंगे कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर दिया जाना चाहिए।
Saturday, October 23, 2010
इतनी छूट क्यों?
आखिर भाई लोग चाहते क्या हैं ? साथ ही साथ हमारे देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार की मंशा क्या है? जम्मू कश्मीर के अलगाव वादी नेता और डेढ़ सयाने बुद्धिजीवी दिल्ली में मजमा लगाकर देश और संविधान के खिलाफ जहर उगलते रहें और देश के कर्णधार उनके भाषणों की सीडी देखने के बाद कुछ करने या न करने की बात करें तो इस विडम्बना पर रोने के सिवा हम और आप क्या कर सकते है? लेकिन इस रोने धोने से कुछ होने वाला नहीं है.क्योंकि दिल्ली की गद्दी पर बैठे सत्ताधीश देश और संविधान को लेकर इतने गंभीर है ही नहीं। वर्ना जब अलगाववादी देश की राजधानी में राष्ट्रद्रोह को बढ़ावा देने का काम कर रहे थे, तब केंद्र सरकार कार्रवाई करने के बजाय हाथ पर मूकदर्शक बनी क्यों बैठी रही। ध्यान रहे की संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
अलगाववादियों ने सरकार की नाक के ठीक नीचे राष्ट्रद्रोह को बढ़ावा देने के लिए एक सम्मेलन आयोजित किया। इसमें कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ नक्सलियों व खालिस्तान समर्थकों ने भी देश की एकता व अखंडता के खिलाफ जमकर जहर उगला। इस घटना से पूरा देश स्तब्ध है लेकिन यह बेहद आश्चर्यजनक है कि सब कुछ जानने-समझने के बावजूद केंद्र सरकार चुपचाप देखती रही। मूकदर्शक बनी रही । यह देश को मंजूर नहीं है और होना भी नहीं चाहिए।
हुर्रियत नेता गिलानी की कश्मीरियत की परिभाषा कश्मीर के लोगों व वहां की संस्कृति से एकदम अलग है। गिलानी लोगों को सिर्फ नफरत सिखा रहे हैं। इस समस्या का तानाबाना भले ही सरहद पार बुना जाता हो, लेकिन दिल्ली की सरकार भी कम नहीं है। यहां पर कश्मीर समस्या एक उद्योग बन गई है। राजनीतिक वर्ग ने बेहद निकम्मेपन का सबूत दिया है। कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला व उनके पिता केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला को किसने आगे बढ़ाया है? आखिरकार राजनीति में चंद खानदान ही नजर क्यों आते हैं। देश के वफादार की जगह निजी वफादार से राजनीति चले, इस सोच से यह सब हो रहा है। अब जरा
हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के बयां को भी देखें। गिलानी ने कश्मीर पर नियुक्त किए गए केंद्र सरकार के वार्ताकारों को फिजूल बताते हुए इनका बहिष्कार करने की घोषणा कर दी उनहोंने केंद्र सरकार के इस कदम को फरेबकारी बताते हुए सिर्फ समय टालने वाला कवायद बताया । उनकी आवाज में आवाज मिलाते हुए लेखिका अरुंधति राय भी कह गयी कि कश्मीर कभी भारत का अभिन्न अंग रहा ही नहीं। उन्होंने भारत को उपनिवेशवादी भी बताया।
गिलानी ने राजधानी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने जो वार्ताकार नियुक्त किए हैं, उनका राज्य के सभी गुटों को बहिष्कार करना चाहिए। ये वार्ताकार वहां जा कर क्या करेंगे। यह तो सभी को मालूम है कि राज्य की जनता क्या चाहती है। घाटी ही नहीं, बल्कि जम्मू और लद्दाख के लोगों को हिंदुस्तान के बलपूर्वक कब्जे से आजादी चाहिए। गिलानी के मुताबिक सिर्फ मुसलमान ही नहीं, राज्य के हिंदू और सिखों को भी आत्म निर्णय का हक चाहिए। इसका पता करने के लिए किसी वार्ताकार की जरूरत नहीं है। यह सिर्फ समय बिताने की फरेबकारी कवायद है।
राजनीतिक कैदियों की आजादी के लिए समिति' की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन संसद पर हमले के आरोप से बरी हो चुके एसएआर. गिलानी ने किया। इसी मौके पर लेखिका अरुंधति राय ने भी अलगाववादियों के पक्ष में जम कर तर्क दिए। इन अलगाववादी आंदोलनों को उन्होंने जन-आंदोलन बताया। साथ ही कहा कि कश्मीर को बार-बार भारत का अभिन्न अंग बताया जाता है, जबकि यह कभी अभिन्न अंग रहा ही नहीं। उनहोंने कहा कि चाहे कश्मीर के आंदोलनकारी हों या नगालैंड के या फिर नक्सली, ये जन आंदोलन हैं। इसलिए इनकी आवाज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहिए। वैसे तो विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन भी जन आंदोलन है, लेकिन इसमें फर्क यह है कि यह 'सबके लिए न्याय' के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, जबकि अलगाववादी बताए जाने वाले ये आंदोलन इस भावना पर आधारित हैं। अब इन लेखिका से पूछा जाना चाहिए कि सीमा पर कि मदद से चलाये जा रहे देश विरोधी अभियान को जन आन्दोलन कैसे कहा जा सकता है? मैडम अयून्धाती राय का सारा चितन अभिजात्य सोच पर आधारित है। वे उस वर्ग की लेखिका है जो इस भारत गणराज्य की गरीबी पर पंचतारा होटलों में बैठकर वाग्विलास करते है। देश की जमीनी सच्चाई का उनको जरा भी अहसास नहीं है। गिलानी किस मुह से कश्मीर के हिन्दुओं की बात कर सकते है । खासकर तब जब कि लाखो कश्मीरी पंडित अब भी दिल्ली और आस पास खानाबदोशों कि जिंदगी जी रहे हों। अरुंधती राय ने भोग ही क्या है? नक्सली हिंसा में जो निरपराध मारे गए उनका दोष क्या था? यह किस तरह का जन आन्दोलन है जिसमे जन से ज्यादा गन ( बन्दूक) कि आवाज़ सुने पड़ती है। मैडम राय खुलेआम देशद्रोह का महिमा मंडन कर रही थी और देश कि कठपुतली सरकार मौन थी। यह बेहद शर्मनाक है। विहिप के आन्दोलन की तुलना कश्मीरी आतंक वादियों से करना मानसिक दिवालियापन ही कहा जा सकता है। क्या एक परिपक्व लोकतंत्र का अर्थ यह है कि जिसके मन में जो आये बक दे। इस तरफ भी विचार होना चाहिए।
Friday, October 22, 2010
कर्नाटक का नाटक

कर्नाटक का यह राजनैतिक ड्रामा गोवा और झारखंड में हो चुके नाटक की पुनरावृत्ति ही है। सवा ल उठता है कि लोकतंत्र कैसे काम करेगा, यदि इसके रक्षक ही भक्षक बनने पर उतारू हो जाएं? यहां तो विधायक से लेकर मंत्री तक और स्पीकर से लेकर गवर्नर तक सभी अपने अपने हिसाब से खेल खेलने लगे हैं और ऐसा करते समय नियमों और कायदों को अंगूठा दिखाने लगे हैं। ऐसी हालत में अदालत का ही आसरा रह जाता है। राज्यपाल का उत्साह तो इस खेल में देखते बन रहा था। उन्होंने आनन फानन में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। जब केंद्र की सरकार ने उस सिफारिश को गर्मजोशी से नहीं लिया तो फिर राज्य सरकार को दुबारा विश्वास मत हासिल करने को कह दिया। जिन विधायकों को स्पीकर ने विधानसभा की सदस्यता से बर्खास्त कर दिया, वे अदालत की शरण में चले गए और अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रखकर और फैसले का दिन आगे खिसकाकर भ्रम को और भी बढ़ाने का काम किया। यह बहुत ही शर्मनाक है कि विधायकों को रिजॉर्ट में ताला लगाकर बंद रखा गया। उन्हें जेट विमानों और हेलिकॉप्टरों की सहायता से पड़ोसी राज्यों मे ले जाया गया। पांच सितारा होटलों में ठहराया गया। यदि इस तरह की घटनाएं घटती हैं, तो फिर सदन में बहुमत परीक्षण की जांच निष्पक्षता से कैसे हो सकती है? एक पूर्व मुख्यमंत्री डी कुमारस्वामी दूसरी पार्टी के विधायकों को भेड़ की तरह दूसरे राज्यों में ले जाते दिखाई दिए और लोकलाज को दरकिनार कर दूसरी पार्टी के असंतुष्ट विधायकों के प्रवक्ता की तरह बोते नजर आए। कांग्रेस का खेल भी इस प्रकरण में गंदा रहा। मुख्यमंत्री ने जिस तरह से सोमवार को विधानसभा में विश्वासमत हासिल किया वह तरीका अनेक सवाल पैदा कर रहा था। स्पीकर ने जिस तरह से भाजपा के असंतुष्ट विधायकों और निर्दलीयों की सदस्यता समाप्त की वह भी कई लोगों को समझ में नहीं आ रहा था। अंत में वह मामा कोर्ट के पास पहुचा। फिर राज्यपा ल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। वह भी आपत्तिजनक था। उसके बाद उन्होंने यू टर्न लेते हुए उस सिफारिश को वापस ले लिया और फिर मुख्यमंत्री से दुबारा बहुमत साबित करने के लिए कह दिया। यह भी काफी दिलचस्प था। केंद्र सरकार को राच्य सभा में बहुमत प्राप्त नहीं है, इसलिए वह कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लागू करने की जोखिम नहीं उठा सकती थी, इसलिए वह भी कोई साफ साफ निर्णय नहीं ले पा रही है। यही कारण है कि कांग्रेस के केंद्रीय आलाकमान ने अपने आपको इस मसले से अलग कर लिया है और उसने सब कुछ केंद्र सरकार पर छोड़ दिया है। संकट का मूल कारण धनबल है। चुनावों में भी काफी पैसे खर्च किए जाते हैं। चुनाव जीतकर विधायकों के बीच ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की चाह पैदा हो रही है। कुछ विधायकों ने तो साफ साफ कहा कि उन्होंने पाला बदल करने के लिए काफी पैसे मिले हैं। पैसा बांटने का यह खेल सरकार विरोधियों तक ही सीमित नहीं रहा है। जनता दल (एस) के कुछ विधायकों का कहना है कि सरकार के समर्थन के लिए उन्हें भी पैसे की पेशकश की गई। यहां एक दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज्यादा पैसा देने वाला कुछ समय के लिए तो विधायकों का विश्वास हासिल कर सकता है, लेकिन वह हमेशा के लिए उनका विश्वास नहीं पा सकता। कुछ दिन पहले अपने पैसे की ताकत से खनिज माफिया के रूप मे जाने वो रेड्डी बंधु अपनी पार्टी की सरकार को ही गिराने पर तुले हुए थे, पर आज वे उसे बचाने के लिए चिंतित हैं। इसका कारण है कि उनकी आर्थिक हित वर्तमान सरकार के तहत ही सुरक्षित रह सकते हैं, राष्ट्रपति शासन अथवा कांग्रेस सरकार के तहत नहीं। भाजपा सरकार ने दुबारा विश्वासमत हासिल कर लिया है, लेकिन इस सरकार का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखाई देता। इसका कारण है कि भाजपा के अंदर भी अनुशासन नहीं है। मुख्यमंत्री को हटाने के लिए पार्टी की एक लॉबी ही सक्रिय है। धनशक्ति का भूत भी सरकार को हमेशा सताता रहेगा।
Wednesday, October 20, 2010
कसाब का नया स्टंट
मुंबई में हुए २६/११ आतंकी हमले के एक मात्र जीवित एवं बंदी आरोपी मोहम्मद आमिर अजमल कसाब को उसके किये अपराध के लिए विशेष अदालत मौत की सजा सुना चुकी है। देश में कानून की स्थापित परम्पराओं के पालन के लिए उसे उच्च अदालत में अपील का मौका दिया गया है। इसी के तहत उसे विडियो काम्फ्रेसिंग के जरिये अदालत के सम्मुख उपस्थित होना था। इसी उपस्थिति के दौरान कसाब ने उत्तेजित होकर कैमरे पर थूक दिया। यह कोई सहज खीज या क्रोध की अभिव्यक्ति नहींहै। दरअसल कसाब एक बेहद आला दर्जे का आतंकी है। वह इससे पहले भी जेल में जेलकर्मियों के साथ बल प्रयोग कर चूका है। उसका मकसद हमारे सुरक्षा कर्मियों को मरना पीटना या उन्हें हानि पहुँचाना नहीं है। वह तो बहुत ही शातिराना ढंग से अपनी चलें चल रहा है। कसाब का मकसद सुरक्षाकर्मियों को उकसाना है ताकि वे गुस्से में कुछ ऐसा कर बैठे कि देश और देश के बाहर बैठे आस्तीन के दोस्तों को यह मौका मिल जाये कि वे यह शोर मचा सकें कि भारत गणराज्य में जेलों में बंद कैदियों का जीवन सुरक्षित नहीं है। उसे अच्छी तरह मालूम है कि यह सिर्फ भारत में ही संभव है जहाँ अफज़ल गुरु जैसे आतंकवादियों के समर्थन में लोग नारेबाजी करने से नहीं चूकते। फिर कसाब तो करोड़ों का सिक्का है। अफज़ल गुरु के पैरोकार तुरंत कसाब के लिए भी निकल पड़ेंगे। उनको देश, काल , मान-सम्मान से कहीं अधिक अपनी दुकानदारी कि चिंता है। वे हर उस जगह अपनी टांग अडाये नज़र आयेंगे जहाँ कोई मामला ऐसा नज़र आये जिसमे उन्हें देश के बहुसंख्यक वर्ग को चिढाने और अल्पसंख्यक वर्ग को सब्जबाग के सपने दिखाने के अवसर मिलें। कसाब जानता है कि कोई न कोई तो भारतवासी उसके लिए भी मुठ्ठी तन गेगा। इसलिए वह अपने होने का अहसास दिलाने का प्रयास कर रहा है। कि भाई लोग जागें और मानवाधिकार कि चाबुक उठाकर से सुरक्षाकर्मियों को पीटें। हम हिन्दुस्तानियों कि यही खासियत कसाब जैसों को मेहमान का दर्जा देकर उन्हें अपराधी से सीधे साधू या एक विशिष्ट व्यक्ति बना देते हैं। क्या कसाब कि ही तरह अन्य कैदियों को विशेष सुविधा मिलती है? बिलकुल नहीं। फिर कसाब कि क्या खासियत है ? कुछ तो है जो उसे अब तक एक कैदी से ज्यादा एक मेहमान कि तरहकीdइलवा रही हैं। वर्ना क्यों नहीं उससे भी ठीक वैसा ही व्यवहार किया जाता जैसा एक सामान्य कैदी से किया जाता है। उसकी विशेषता यही है कि वह २६ /११ का खलनायक है। वह पहला आतंकी नहीं है जो हमारी सुरक्षा व्यवस्था का मजाक उदा रहा है। उसके भी आका हैं जो मौके की तलाश में हैं । हम शायद एक और २६/११ या कंधार का इंतजार कर रहे हैं। ताकि कुछ सिरफिरे फिर यहाँ आयें और कंधार कांड की पुनरावृत्ति करें।तब तक हमें कसाब को पालना ही है। कसाब भी यह सत्य जानता है। और इसीलिए वह वाही हरकतें कर रहहि जो उसके मकसद को पूरा करती हैं।
Saturday, October 16, 2010
क्या चाहते है बुखारी?
लखनऊ। दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी तथा उनके समर्थकों ने १५ अक्तूबर को अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ के गत 30 सितंबर के फैसले के बारे में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में एक पत्रकार की जमकर पिटाई की।
यह घटना उस समय हुई जब एक उर्दू अखबार के पत्रकार मोहम्मद अब्दुल वाहिद चिश्ती ने बुखारी से अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर सवाल पूछा और इस बात पर उनका रुख जानना चाहा कि खसरा-खतौनी में झगड़े वाली जमीन वर्ष 1528 से राजा दशरथ के नाम पर दर्ज है और उसके बाद वहां बाबरी मस्जिद बनी है। शुरुआत में तो शाही इमाम ने सवाल को टालने की कोशिश की लेकिन पत्रकार के बार-बार पूछने पर बुखारी और उनके समर्थक आपा खो बैठे और पत्रकार पर झपट पड़े।
बुखारी ने चिल्लाते हुए कहा कि इस आदमी को प्रेस कांफ्रेंस से बाहर ले जाओ यह कांग्रेस का एजेंट है। उन्होंने पत्रकार से कहा कि बेहतर होगा कि तुम अपना मुंह बंद रखो। तुम्हारे जैसे गद्दारों की वजह से ही मुसलमानों का अपमान हुआ है।
बाद में, चिश्ती ने आरोप लगाया कि बुखारी अयोध्या मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद अपने भड़काऊ बयानों से सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने इल्जाम लगाया कि मैंने सिर्फ वर्ष 1528 के भू अभिलेखों में विवादित जमीन के राजा दशरथ के नाम पर दर्ज होने के बारे में बुखारी की राय जाननी चाही थी लेकिन इस पर वह आपा खो बैठे और उन्होंने तथा उनके समर्थकों ने मुझे पीटा।
चिश्ती ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले से ऐन पहले तक बुखारी यह कह रहे थे कि अदालत का निर्णय सभी को स्वीकार्य होगा लेकिन फैसला आने के बाद उनके सुर बदल गए और उन्होंने निर्णय के खिलाफ भड़काऊ बयान देना शुरू कर दिया। वह देश में अमन-चैन कायम नहीं रहने देना चाहते। वह मुल्क में दंगे भड़काना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि देश की एकता और सौहार्द के लिए जरूरी है कि अगर वह जमीन राजा दशरथ के नाम पर दर्ज है तो उसे हिंदुओं को सौंप दिया जाए।
इसके पूर्व, बुखारी ने संवाददाताओं से कहा कि अयोध्या मामले पर हाई कोर्ट का फैसला पूरी तरह आस्था पर आधारित है और मुसलमान कौम उसे मंजूर नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि अदालत ने संविधान, कानून और इंसाफ के दायरे से बाहर जाकर वह फैसला दिया है।
शाही इमाम ने कहा कि शरई नुक्तेनजर से इस मसले का बातचीत के जरिए हल निकलने की कोई गुंजाइश ही नहीं है।
बुखारी ने दावा किया कि शरीयत के मुताबिक किसी मस्जिद को मंदिर में तब्दील करने के लिए बातचीत करना या आमराय बनाना हराम है। उन्होंने कहा कि बातचीत के जरिए अयोध्या मसले का हल नहीं निकलेगा और इस मुकदमे से जुड़े मुसलमानों के पक्ष में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए।
अयोध्या विवाद के मुद्दई हाशिम अंसारी द्वारा बातचीत के जरिए मसले की हल की कोशिश किए जाने पर बुखारी ने कहा कि वह अंसारी को गम्भीरता से नहीं लेते क्योंकि वह बार-बार अपने बयान बदलते हैं।
शाही इमाम ने अयोध्या विवाद का बातचीत के जरिए हल निकालने की वकालत कर रहे उलेमा को भी आड़े हाथ लिया।एक छोटा सा सवाल यह है की आखिर बुखारी साहब चाहते क्या हैं। क्या यह देश एक मुद्दे को लेकर फिर एक लम्बी कानूनी जंग में उलझे और बुखारी जैसे लीडर इस मुद्दे पर अपनी दुकाने चलते रहे। बुखारी अकेले नहीं है। उनके साथ चलने के लिए हिन्दुओं के भी लीदरiस मुद्दे को लगातार गरम रखना चाहते हैं। निर्मोही अखाडा सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा कर चूका है। मुस्लिम पेरसोनल ला बोर्ड भी सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए ऐलान कर चूका है। क्या मतलब है इसका ? क्या आप मानते हैं की दोनों कौमो के झंडाबरदार यह चाहते हैं की देश में शांति स्थापित हो? बिलकुल नहीं । अब तक का उनका रवैया यही दिखता है की दोनों पक्ष अपनी अपनी जिद पर अड़कर अपने अपने समाज में गैरजरूरी उत्तेजना फैलाना चाहता हैं। हाई कोर्ट के फैसले के बाद भी देश में रही शांति इन लोगो से देखि नहीं जा रही है। मौलाना बुखारी आग उगलने से परहेज नहीं कर रहे है। लगभग यही हाल दूसरी और भी है। इसके लिए इन लोगो को विशेष श्रम करना पद रहा है। वे राख में अंगारा खोज रहे है।
ताकि देश को फिर सुलगाया जा सके। १९९२-९३ की पुनरावृत्ति ही इनका उद्देश्य है। देश को सांप्रदायिक कुरुक्षेत्र में बदलना उद्देश्य है इन शक्तियों का। इसलिए देशवासियों को बहुत सावधान रहने की जरुरत है। यह समय संयम की परीक्षा का है। बुखारी और तोगड़िया जैसे स्वयंभू धार्मिक नेताओं को बकने दीजिये।
यह घटना उस समय हुई जब एक उर्दू अखबार के पत्रकार मोहम्मद अब्दुल वाहिद चिश्ती ने बुखारी से अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर सवाल पूछा और इस बात पर उनका रुख जानना चाहा कि खसरा-खतौनी में झगड़े वाली जमीन वर्ष 1528 से राजा दशरथ के नाम पर दर्ज है और उसके बाद वहां बाबरी मस्जिद बनी है। शुरुआत में तो शाही इमाम ने सवाल को टालने की कोशिश की लेकिन पत्रकार के बार-बार पूछने पर बुखारी और उनके समर्थक आपा खो बैठे और पत्रकार पर झपट पड़े।
बुखारी ने चिल्लाते हुए कहा कि इस आदमी को प्रेस कांफ्रेंस से बाहर ले जाओ यह कांग्रेस का एजेंट है। उन्होंने पत्रकार से कहा कि बेहतर होगा कि तुम अपना मुंह बंद रखो। तुम्हारे जैसे गद्दारों की वजह से ही मुसलमानों का अपमान हुआ है।
बाद में, चिश्ती ने आरोप लगाया कि बुखारी अयोध्या मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद अपने भड़काऊ बयानों से सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने इल्जाम लगाया कि मैंने सिर्फ वर्ष 1528 के भू अभिलेखों में विवादित जमीन के राजा दशरथ के नाम पर दर्ज होने के बारे में बुखारी की राय जाननी चाही थी लेकिन इस पर वह आपा खो बैठे और उन्होंने तथा उनके समर्थकों ने मुझे पीटा।
चिश्ती ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले से ऐन पहले तक बुखारी यह कह रहे थे कि अदालत का निर्णय सभी को स्वीकार्य होगा लेकिन फैसला आने के बाद उनके सुर बदल गए और उन्होंने निर्णय के खिलाफ भड़काऊ बयान देना शुरू कर दिया। वह देश में अमन-चैन कायम नहीं रहने देना चाहते। वह मुल्क में दंगे भड़काना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि देश की एकता और सौहार्द के लिए जरूरी है कि अगर वह जमीन राजा दशरथ के नाम पर दर्ज है तो उसे हिंदुओं को सौंप दिया जाए।
इसके पूर्व, बुखारी ने संवाददाताओं से कहा कि अयोध्या मामले पर हाई कोर्ट का फैसला पूरी तरह आस्था पर आधारित है और मुसलमान कौम उसे मंजूर नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि अदालत ने संविधान, कानून और इंसाफ के दायरे से बाहर जाकर वह फैसला दिया है।
शाही इमाम ने कहा कि शरई नुक्तेनजर से इस मसले का बातचीत के जरिए हल निकलने की कोई गुंजाइश ही नहीं है।
बुखारी ने दावा किया कि शरीयत के मुताबिक किसी मस्जिद को मंदिर में तब्दील करने के लिए बातचीत करना या आमराय बनाना हराम है। उन्होंने कहा कि बातचीत के जरिए अयोध्या मसले का हल नहीं निकलेगा और इस मुकदमे से जुड़े मुसलमानों के पक्ष में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए।
अयोध्या विवाद के मुद्दई हाशिम अंसारी द्वारा बातचीत के जरिए मसले की हल की कोशिश किए जाने पर बुखारी ने कहा कि वह अंसारी को गम्भीरता से नहीं लेते क्योंकि वह बार-बार अपने बयान बदलते हैं।
शाही इमाम ने अयोध्या विवाद का बातचीत के जरिए हल निकालने की वकालत कर रहे उलेमा को भी आड़े हाथ लिया।एक छोटा सा सवाल यह है की आखिर बुखारी साहब चाहते क्या हैं। क्या यह देश एक मुद्दे को लेकर फिर एक लम्बी कानूनी जंग में उलझे और बुखारी जैसे लीडर इस मुद्दे पर अपनी दुकाने चलते रहे। बुखारी अकेले नहीं है। उनके साथ चलने के लिए हिन्दुओं के भी लीदरiस मुद्दे को लगातार गरम रखना चाहते हैं। निर्मोही अखाडा सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा कर चूका है। मुस्लिम पेरसोनल ला बोर्ड भी सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए ऐलान कर चूका है। क्या मतलब है इसका ? क्या आप मानते हैं की दोनों कौमो के झंडाबरदार यह चाहते हैं की देश में शांति स्थापित हो? बिलकुल नहीं । अब तक का उनका रवैया यही दिखता है की दोनों पक्ष अपनी अपनी जिद पर अड़कर अपने अपने समाज में गैरजरूरी उत्तेजना फैलाना चाहता हैं। हाई कोर्ट के फैसले के बाद भी देश में रही शांति इन लोगो से देखि नहीं जा रही है। मौलाना बुखारी आग उगलने से परहेज नहीं कर रहे है। लगभग यही हाल दूसरी और भी है। इसके लिए इन लोगो को विशेष श्रम करना पद रहा है। वे राख में अंगारा खोज रहे है।
ताकि देश को फिर सुलगाया जा सके। १९९२-९३ की पुनरावृत्ति ही इनका उद्देश्य है। देश को सांप्रदायिक कुरुक्षेत्र में बदलना उद्देश्य है इन शक्तियों का। इसलिए देशवासियों को बहुत सावधान रहने की जरुरत है। यह समय संयम की परीक्षा का है। बुखारी और तोगड़िया जैसे स्वयंभू धार्मिक नेताओं को बकने दीजिये।
Wednesday, October 13, 2010
फिर मोदी

गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में एक बार फिर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का जादू चला है। अहमदाबाद, वड़ोदरा, सूरत, भावनगर, राजकोट और जामनगर में भारतीय जनता पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है।
जाहिर है कि अब मोदी और उनके आलोचकों को कुछ बोलते नहीं बन रहा होगा। महत्वपूण यह है कि ये चुनाव तब हुए जब मोदी और गुजरात सरकार सोहराबुद्दीन मुठभेड़ तथा इशरत जहाँ मामलों को लेकर देश भर में विपक्ष की aआलोचनाओं के निशाने पर थी। परिणाम एक बार फिर भाजपा विशेषकर मोदी के पक्ष में गए हैं। पूरी ईमानदारी से यदि विश्लेषण किया जाए तो अब यह सत्य स्वीकार कर लिया जाना चाहिए कि मुसलमानों और भाजपा के बीच गुजरात में दूरियां कम हुई हैं। अब इसी बहाने यह भी म्स्वीकर किया जाना चाहिए कि बार-बार भेड़िया आया की रत लगा कर आप किसी को अधिक मूर्ख नहीं बना सकते । गुजरात की जनता जिनमे मुस्लमान भी शामिल है , ने वहां विकास को वोट किया है न कि किसी नरेन्द्र मोदी या पार्टी विशेष को। अपने विरोधियों के तमाम वारों को झेलने के वावजूद मोदी हर बार और ज्यादा मजबूत होकर उभरते हैं तो इसके पीछे उनकी विकासोन्मुखी सोच और गुजरात राज्य की जनता को समग्र गुजराती जनता के तौर पर देखना तथा तदनुसार ही राज्य की नीतियों का निर्धारण करना प्रमुख है। किसी भी राज्य के विकास में यह तत्त्व बहुत महत्वपूर्ण है कि जब राज्य की जनता के लिए विकास की योजनायें बने जाएँ तब बिना किसी भेदभाव के उन पर अमल हो और उनका लाभ राज्य के प्रत्येक नागरिक को सामान रूप से मिले। मोदी यह कम करने में सफल रहे हैं। इसलिए जीत का सेहरा उनके ही सर पर बंधा जाए तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि होती है तो यह उसकी अपनी समस्या है लेकिन आत के युवा भारत का मतदाता गड़े मुर्दे उखाड़ने में विश्वास नहीं करता। आखिर आज किसी १८-२० साल के बच्चे को बार-बार बाबरी मस्जिद या राम जन्म भूमि की कहानी सुनाने से उसका क्या भला होना है? आज का युवा शांति चाहता है। आप उसे बार-बार भावनात्मक रूप से इस्तेमाल नहीं कर सकते। यही युवा आपका वोटर भी है जिसे अपने आस पास विकास चाहिए न की थोथे आश्वासन। साथ ही उसे एक धर्मं विशेष की चारदीवारी से भी मुक्ति चाहिए। गोधरा- गोधरा की रत लगाकर मोदी को मुस्लिम विरोधी साबित करने की कोशिश हर बार यदि नाकाम होती है तो इसका एक ही कारन है कीगुजरात का मुस्लिम मोदी को अपना दुश्मन नहीं मानता । नितीश कुमार को भी समझ आना चाहिए।
जाहिर है कि अब मोदी और उनके आलोचकों को कुछ बोलते नहीं बन रहा होगा। महत्वपूण यह है कि ये चुनाव तब हुए जब मोदी और गुजरात सरकार सोहराबुद्दीन मुठभेड़ तथा इशरत जहाँ मामलों को लेकर देश भर में विपक्ष की aआलोचनाओं के निशाने पर थी। परिणाम एक बार फिर भाजपा विशेषकर मोदी के पक्ष में गए हैं। पूरी ईमानदारी से यदि विश्लेषण किया जाए तो अब यह सत्य स्वीकार कर लिया जाना चाहिए कि मुसलमानों और भाजपा के बीच गुजरात में दूरियां कम हुई हैं। अब इसी बहाने यह भी म्स्वीकर किया जाना चाहिए कि बार-बार भेड़िया आया की रत लगा कर आप किसी को अधिक मूर्ख नहीं बना सकते । गुजरात की जनता जिनमे मुस्लमान भी शामिल है , ने वहां विकास को वोट किया है न कि किसी नरेन्द्र मोदी या पार्टी विशेष को। अपने विरोधियों के तमाम वारों को झेलने के वावजूद मोदी हर बार और ज्यादा मजबूत होकर उभरते हैं तो इसके पीछे उनकी विकासोन्मुखी सोच और गुजरात राज्य की जनता को समग्र गुजराती जनता के तौर पर देखना तथा तदनुसार ही राज्य की नीतियों का निर्धारण करना प्रमुख है। किसी भी राज्य के विकास में यह तत्त्व बहुत महत्वपूर्ण है कि जब राज्य की जनता के लिए विकास की योजनायें बने जाएँ तब बिना किसी भेदभाव के उन पर अमल हो और उनका लाभ राज्य के प्रत्येक नागरिक को सामान रूप से मिले। मोदी यह कम करने में सफल रहे हैं। इसलिए जीत का सेहरा उनके ही सर पर बंधा जाए तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि होती है तो यह उसकी अपनी समस्या है लेकिन आत के युवा भारत का मतदाता गड़े मुर्दे उखाड़ने में विश्वास नहीं करता। आखिर आज किसी १८-२० साल के बच्चे को बार-बार बाबरी मस्जिद या राम जन्म भूमि की कहानी सुनाने से उसका क्या भला होना है? आज का युवा शांति चाहता है। आप उसे बार-बार भावनात्मक रूप से इस्तेमाल नहीं कर सकते। यही युवा आपका वोटर भी है जिसे अपने आस पास विकास चाहिए न की थोथे आश्वासन। साथ ही उसे एक धर्मं विशेष की चारदीवारी से भी मुक्ति चाहिए। गोधरा- गोधरा की रत लगाकर मोदी को मुस्लिम विरोधी साबित करने की कोशिश हर बार यदि नाकाम होती है तो इसका एक ही कारन है कीगुजरात का मुस्लिम मोदी को अपना दुश्मन नहीं मानता । नितीश कुमार को भी समझ आना चाहिए।
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